क्रांतिकारी मंगल पाण्डेय का जीवन परिचय व इतिहास | Mangal Pandey biography History in hindi

 क्रांतिकारी मंगल पाण्डेय का जीवन परिचय व इतिहास | Mangal Pandey biography History in hindi



1857 की क्रांति ब्रिटीश शासन के खिलाफ एक बड़ी और अहम् घटना बन कर सामने आयी थी , इस क्रांति की शुरुआत 10 मई, 1857 को मेरठ से हुई, जो की बाद में कानपुर, बरेली, झांसी, दिल्ली, अवध आदि स्थानों पर फैल गई, क्रांति की शुरुआत तो एक सैन्य विद्रोह के रूप में हुई, लेकिन समय के साथ उसका स्वरूप बदल कर ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध एक जनव्यापी विद्रोह के रूप में हो गया, जिसे भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम कहा गया है | इस क्रांति की शुरुआत पहले क्रांतिकारी के तौर पर विख्यात मंगल पांडे ने पहली बार अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह कर के की थी। 

 29 मार्च 1857 को मंगल पांडे ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला था। उन्होंने कलकत्ता के पास बैरकपुर परेड मैदान में रेजीमेंड के अफसर पर हमला कर उसे घायल कर दिया था। उन्हें ऐसा महसूस हुआ था कि यूरोपीय सैनिक भारतीय सैनिकों को मारने आ रहे हैं। उसके बाद उन्होंने ये कदम उठाया था। वे ईस्ट इंडिया कंपनी में सैनिक के तौर पर भर्ती हुए थे। लेकिन बाद में उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा भारतीयों के ऊपर अत्याचार को देखकर अंग्रेजों के खिलाफ आबाज उठायी |

अंग्रेज अधिकारियों द्वारा भारतीय सैनिकों पर अत्याचार तो हो ही रहा था। लेकिन हद तब हो गई। जब भारतीय सैनिकों को ऐसी बंदूक दी गईं। जिसमें कारतूस भरने के लिए दांतों से काटकर खोलना पड़ता है। इस नई एनफील्ड बंदूक की नली में बारूद को भरकर कारतूस डालना पड़ता था। वह कारतूस जिसे दांत से काटना होता था उसके ऊपरी हिस्से पर चर्बी होती थी। उस समय भारतीय सैनिकों में अफवाह फैली थी कि कारतूस की चर्बी सुअर और गाय के मांस से बनाई गई है। ये बंदूकें 9 फरवरी 1857 को सेना को दी गईं। इस्तेमाल के दौरान जब इसे मुंह लगाने के लिए कहा गया तो मंगल पांडे ने ऐसा करने से मना कर दिया था। उसके बाद अंग्रेज अधिकारी गुस्सा हो गए। फिर 29 मार्च 1857 को उन्हें सेना से निकालने, वर्दी और बंदूक वापस लेने का फरमान सुनाया गया। उसी दौरान अंग्रेज अफसर हेअरसेय उनकी तरफ बढ़े लेकिन मंगल पांडे ने भी उन पर हमला बोल दिया। उन्होंने साथियों से मदद करने को कहा लेकिन कोई आगे नहीं आया। फिर भी वे डटे रहे उन्होंने अंग्रेज अफसरों पर गोली चला दी। जब कोई भारतीय सैनिकों ने साथ नहीं दिया तो उन्होंने अपने ऊपर भी गोली चलाई। हालांकि वे सिर्फ घायल हुए। फिर अंग्रेज सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया। 6 अप्रैल 1857 को उनका कोर्ट मार्शल किया गया और 8 अप्रैल को उन्हें फांसी दे दी गई।

मंगल पांडे ने अंग्रेजों के खिलाफ बैरकपुर में जो बिगुल फूंका था। वह जंगल की आग की तरह फैलने लगी। विद्रोह की चिंगारी मेरठ की छावनी पहुंच गई थी। 10 मई 1857 को भारतीय सैनिकों ने मेरठ की छावनी में बगावत कर दी। कई छावनियों में ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ गुस्सा तेज हो गया था। यह विद्रोह पूरे उत्तर भारत में फैल गया। इतिहासकारों का कहना है कि विद्रोह इतना तेजी से फैला था कि मंगल पांडे को फांसी 18 अप्रैल को देना था लेकिन 10 दिन पहले 8 अप्रैल को ही दे दी गई। ऐसा कहा जाता है कि बैरकपुर छावनी के सभी जल्लादों ने मंगल पांडे को फांसी देने से इनकार कर दिया था। फांसी देने के लिए बाहर जल्लाद बुलाए गए थे। 1857 की क्रांति भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम था। जिसकी शुरुआत मंगल पांडे के विद्रोह से शुरू हुआ था। 

अमर शहीद मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा में एक ब्रह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम दिवाकर पांडे और माता का नाम अभय रानी था। हालांकि कई इतिहासकार ने बताया है कि उनका जन्म फैजाबाद जिले की अकबरपुर तहसील के सुरहुरपुर गांव में हुआ था। वे 1849 को ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भर्ती हुए। उन्हें बैरकपुर की सैनिक छावनी में 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री में शामिल किया गया था। वे पैदल सेना के 1446 नंबर के सिपाही थे। वे काफी लगनशील थे और भविष्य में बड़ा काम करना चाहते थे

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